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Monday, September 10, 2012

Kumar Anil : Dhu-Dhu Kr Jlti Betiyan (charchamanch)

     धू -धू  कर जलती बेटियाँ 
 

 ज़ुल्म की नई तहरीर लिखकर किताबों में  
 शब्द 'बेटी'का क्यूँ वेहद विषैला कर दिया है

 फिज़ाओं  में ज़हर के उन्नत बीज बोकर
 हवाले मौत के अब बेटिओं को कर दिया है 

 आगमन को चीख  की परिभाषा बनाकर   
 खून से बदरंग अपने घर को कर दिया है 

शब्द 'बेटी'का माथे की सिकन अब हो गया
वहशिओं ने कितना घुप अँधेरा कर दिया है 

धू-धू  आग में जलना बेटिओं  का  देख कर
ख़ून सारा जिश्म का अब खौलने लग गया है

रोशनी के पाँव क्यूँ  गुम हो गए यूँ अंधेरों में 
हल इसका ढूढ़ना अब वेहद ज़रूरी हो गया है 

बस इक गुज़ारिश यह  है मेरी जम्हूरियत से
 जलाते बेटिओं को जो उनको जलाना जरूरी हो गया है    


                       अज़ीज़ जौनपुरी 




 
 
 




  




 
  


 

7 comments:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

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  2. आह.....
    मार्मिक अभिव्यक्ति....
    बहुत बढ़िया...

    सादर
    अनु

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  3. vedna ki dasta ,sirfir ki kahani,bahut accha likha hai

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  4. बिटिया की महिमा अनन्त है।
    बिटिया से घर में बसन्त है।।

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  5. ज़ुल्म की नई तहरीर लिखकर किताबों में
    शब्द 'बेटी'का क्यूँ वेहद विषैला कर दिया है

    फिज़ाओं में ज़हर के उन्नत बीज बोकर
    हवाले मौत के अब बेटिओं को कर दिया है


    शब्द 'बेटी'का माथे की सिकन अब हो गया
    वहशिओं ने कितना घुप अँधेरा कर दिया है ...........बेहद चुभन भरी व्यंजना ...बड़ा गर्क हो इन वाशियों का इनके पूत दिलवाएं इन्हें काशी करवट ,....
    ram ram bhai
    बुधवार, 12 सितम्बर 2012
    देश की तो अवधारणा ही खत्म कर दी है इस सरकार ने .

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  6. बेटियों के माँ बाप ही उन्हें बोझ समझेंगे अगर
    जमाने को कहें क्या वह तो बेगाना हो गया है ।
    बेटियों को सक्षम बनाना अब जरूरी हो गया है
    उन्हें लडने के काबिल बनाना जरूरी हो गया है ।

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  7. उम्दा !!

    ये तो कुछ कुछ ऎसा हो गया है
    जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना नहीं........

    जलाओ उन्हें पर रहे ध्यान इतना
    जलाने वाल फिर कोई बच ना पाये...

    आदमी जला भी दिया गया माना
    बात तो तब है जब कोई उसकी
    ये जलाने वाली आदत को जलाये
    फिर इस जहाँ में भूल से भी
    बेटी जल गयी कहीं कोई कह ना पाये !

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