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Thursday, September 12, 2013

अज़ीज़ जौनपुरी : न ज़ले न ख़ाक हो

  न ज़ले न ख़ाक हो 

 हाय ये ज़िन्दगी न ज़ले,न ख़ाक हो,न आग़ लगे
 फ़क़ीर  कौम  के आये  हैं न सुर लगे न राग लगे. 

 हाय री क़िस्मत , कि  मर्सिया ही  उन्हें  फ़ाग लगे 
 ख़ाली बोतल सी जवानी के मुंह पे  जैसे क़ाग लगे  

अज़ीब हाल  है सोज़े- ज़हन्नुम भी उन्हें  बाग लगे   
कि  इधर  घर से ज़नाज़ा उठे औ उधर सुहाग लगे 

लुफ्त ख़त्म हो गया  औ  जवानी पकड़ के बैठे हैं 
 हाय ये जवानी न जले ,न खाक हो ,न आग लगे 

 है  बहुत  कुछ  मिज़ाज़  पर मौकूफ़ समझ लीजे 
 मिज़ाज़  भी  ऐसा  की  न राह  लगे न आग़ लगे

 1. नोहा ---शोक गीत , मर्सिया -मृत्यु शोक गीत
सोज़े-ज़हननुम --नर्क की सेज़,
                                             अज़ीज़ जौनपुरी