Pages

Google+ Badge

Wednesday, July 3, 2013

अज़ीज़ जौनपुरी : सिक्का उछाल आया

        
       सिक्का  उछाल आया 



   उँगलियाँ ख़ुद पे उठा ख़ुद से सवाल कर आया 
   लिख सच को सच  एक नया बवाल कर आया 

   रौशनी  मयस्सर न हुई  ज़िन्दगी की राहों को
   खुली हकीकत तो  इक नया सवाल कर आया

   जिस्म  के  बाज़ार   में लग  रहीं  थीं  बोलियाँ
   एक खोटा  सिक्का  मैं  भी  उछाल  कर आया

   ज़ुल्म  की बुनियाद पर बन रहा  था इक महल
   सिर्फ़ दिवारें नहीं   चूलें  तक हिला  कर  आया

    न थी इब्तदा की ख़बर न इन्तहा  मालूम मुझे
   आज तू भी अज़ीज़ इक नया कमाल कर आया

    सिरफिरों  की   इस  अज़ीब   दुनियाँ  में  आज
    न  जाने आज़ किस-किस का ख़याल कर आया

    ज़ख्म थे ,खूँ की दरिया थी,हर गाम पे पहरा था
    कूचा -ए -कातिल  में ख़ुद को हलाल कर आया

   राहे - फ़कीरी  मुस्किल  हो  गई  आज़ दुनियाँ में
   देख एक फ़क़ीर को रोता ख़ुद से सवाल कर आया

                                          अज़ीज़ जौनपुरी