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Friday, September 18, 2015

अज़ीज़ जौनपुरी : तोड़ दी माला किसी नें






नाम चरणामृत का लेकर
विष  पिला डाला किसी नें 
जब सुमिरनी  हाथ में ली
तोड़  दी  माला  किसी नें 

सत्य की इक मूरत गढ़ी थी 
चूर  कर   डाला   किसी  नें
न्याय  की  जब  दी  दुहाई
बेडीं पाँव में डाला किसी नें 

ले  हाथ  समिधा ज्यों बढ़ा
बुझा दी अग्नि-ज्वाला किसी नें 
आरती      की    थाल   से 
घर   जला  डाला  किसी नें 

बन  के   मीरा  जब  पुकारी
दे   दिया   प्याला  किसी नें 
वीणा  जब  अहिंसा  की उठी
धड़ अलग कर डाला किसी नें 


                अज़ीज़ जौनपुरी


 




Wednesday, January 7, 2015

अज़ीज़ जौनपुरी : पिया गंध मोरे सांसन में है


                  



सुख  दुख  का  है ताना  बाना
जीवन   तो   है   आना  जाना

जोलहा जी  इक साड़ी बनाना
रंग  पिया  ओहमा  भर  जाना

जीवन है सांसों    की    गठरी  
कभी   ओढ़ना  कभी बिछाना

पिया  गंध  मोरे  सांसन में है
वही  सूँघना   वही   सुंघाना   

काशी    देखी    मथुरा   देखा 
कण कण  मोरे पिया समाना

काबे   गया   कैलाश  भी देखा 
देखली  पिया  का  ताना बाना

मकड़   जाल  जीवन  है सारा 
मेरो  पिया  मोहें तुम्हीं बचाना

अँखियन में मोरे तुम्हरी सूरत
पलक  सेज  पर  मोहे  सुलाना

अँखियन से असुवन ढरकत है
असुवन को  तुमही समझाना

जिवन में  एक आस  तुम्हारी
डोर प्रीति  की  नहिं  उलझाना

चली चला का समय है आया
तुम्हरे संग मोहे है उड़  जाना

                      अज़ीज़ जौनपुरी
              
ओहमा --उसमें

Tuesday, December 23, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : मिलन की घड़ी में प्रणय दीप पावन





 मिलन की घड़ी में प्रणय दीप पावन 
 तुम्हीं  ने जलाए  तुम्हीं  नें बुझाए 
 लिखी थी कहानी कहीं इक शिला पर 
 समय के बवंडर नें जिसको मिटाए

 छिन गई सारी खुशियाँ जीवन की अपने 
 चादर तिमिर की किसी ने उढाए
 चमन में न तितली दिखती कहीं भी 
 तूफ़ा ने कितने कहर ज़ुल्म ढाए

 इक तस्बीर आँखों में उभरी थी कोई 
 समय के थपेड़ो ने जिसको मिटाए 
 ख्वाहिशें चूमने के धरी रह गईं 
 वक्त नें भी न जाने सितम कितनें ढाए

 इक लिखी थी कहानी आँसुओं को पिरोकर
 जिसको अपनों  नें खारा समंदर बताए
 पर लगा कर उड़ा था गगन चूमनें मैं 
 काट मेरे परों को किसी नें गिराए 

 बन शलभ दीप पर जब मिटने चला 
 दिए प्यार के किसी नें बुझाए 
 माँगी थी मिटटी से महक जिंदगी की 
 बिकल प्राण मेरे किसी नें उड़ाए
 
 प्रणय की डगर पर जब बढे पाँव मेरे 
 किसी नें डगर पर कांटें बिछाए 
 उठा शूल बक्ष में जब अपनें चुभोया 
 लहू को किसी नें पानी बताए 
 
 अर्चना प्यास में छटपटाती रही 
 बंदना के सकल स्वर किसी नें मिटाए 
 उजालों का स्वागत जब करने बढ़ा 
 तिमिर को धरा पर किसी नें बुलाए

 ले चला थाल में जब पुष्प अर्चना के 
 सकल पुष्प थाली के किसी ने गिराए 
 जब उठा पुष्प मैंने लगाया ह्रदय से 
 श्याम मेघो ने कितने बिजली गिराए  

 मधुर मुस्कान मेरी कहीं  खो गई 
 मैनें सपनों में कितने आंसू बहाए 
 डोर उम्मीद की पकड़ मैं जब निकला  
 प्रणय पथ पर किसी नें तुहिन कण बिछाए 

                 अज़ीज़ जौनपुरी

Saturday, December 13, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : सूनी सेज तुम्हरि बिन साजन






कहाँ   गयो  मेरो   प्रीतम    प्यारे
अँखियाँ   रोअत    साँझ    सकारे
सूनी  सेज  तुम्हरि बिन   साजन
कब   होइहीं   धन    भाग  हमारे


बहुत   दिनन  से  अँखियाँ  तरसत
कहाँ   छुप  गए  मेरो साजन प्यारे
छतिया  बिच  अगिया  दहकत  हैं
घिर  - घिर   आवत    बदरा   कारे 

दरस  परस  बिन अँखियाँ  रोअत
कब   आओगे    मेरो मोहन प्यारे
मन  मंदिर में बस  तुम्हरी सूरत
तुम  बिन  जीवन भयो  अंधियारे

कबिरा तोहे  संग  व्याह  रचायो
संग सातव  बचन  पढ़ायो  प्यारे
निरखत अँखियाँ रोअत अँखियाँ
अब आ भी  जाओ  मोहन प्यारे

सेजिया     सूनी    मंगिया  सूनी
कबीरा   रोअत   दिलवा   उघारे
केहि सवतन संग सेजिया सोवत
काहे      फूटल       भाग    हमारे

न   मरती   आस   न  जाती सांस
रोवत      कबिरा    द्वारे -   द्वारे
मन-मन्दिर माँहि भयो अँधियारा
दे  दरस  परस  कर  दो   उजियारे

उघारे --खोल कर
धन भाग -- भाग्य का धन्य होना
केही --किस
माँह--के भीतर 
काहे--किसलिए                       अज़ीज़ जौनपुरी




Thursday, December 11, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : न रोज खाता न उधार करता हूँ



न  रोज  खाता  हूँ   न  उधार  करता हूँ
न ग़मों को जिंदगी में सुमार करता हूँ

ज़ुल्मों-सितम कभी मेरे ख़ूँ में नही रहा 
मैं खुद पे  बेइन्तिहाँ   ऐतबार  करता हूँ

दुनिया की खातिर रेहन  रख दिया खुद को  
खुद से ज्यादा मैं दुनिया को प्यार करता हूँ

इश्क -ए- ख़ुदा पे  इक  किताब  लिखी है
सच है कि खुदा पे मैं जाँ निसार  करता हूँ

न हसरते -दीद रही न दस्ते -उम्मीद रही
अपनी  खमोशिओं को मैं  बहार  कहता हूँ

सजा  के  रोज  रूखे- अज़ीज़   पे  गुन्चें
मैं   खुद  को   अपना   यार    कहता हूँ

सहन उनका मुनव्वर वक्ते -नेक रहे
मैं इक फ़क़ीर हूँ,ख़ुदा का इंतजार करता हूँ


               अज़ीज़ जौनपुरी

Sunday, November 30, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : साधुवेश भेड़िया है औ है किसी मंत्री का साला




रामनामी  ओढ़  कर  जो  जप  रहा  है  रूद्र - माला
है  वही  यह  शख्स  जिसके खूँ में लिखा है घोटाला

कर  लिया  है  उसने   देखो   छद्म  रूप  ग्रहण  कैसे
साधुवेश  भेड़िया  है  औ  है  किसी  मंत्री  का साला

थी  लूटी  कल इसीनें  आबरू, माथे पर लगा चन्दन
मिला  ज़हर  जिसने  दवा  में  मुह कर दिया  काला

क्या कहें,  कैसे  कहें,  किसको  कहें  , इस   भीड़ में
सजिसों  के  मुल्क में    दाल  में   है  कुछ तो काला

अर्थी उठ गई विश्वास की सत्य आग में है जल रहा 
व्यभिचार चोरी औ डकैती का दिख रहा है बोलबाला

ले व्रत कत्ल खून औ फ़िरौती लूट पाट औ   छिनैती
रक्षक बन के  भक्षक  देखो  जप  रहे अन्याय-मला

देखो  कहीं  ये   इस  मुल्क  को  न  नीलाम  कर दें
सिर्फ  ख़ुदा  ही  बचा  है  मुल्क  का  एक  रखवाला

                                           अज़ीज़ जौनपुरी





Friday, November 28, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : तेरी खुशबू तेरा हुश्ने ज़माल रखता हूँ





   ज़िगर  में  अपने जब्ते- नाल रखता हूँ 
   तेरी खुशबू तेरा हुश्ने  जमाल रखता हूँ

   तेरी दोशीजगी हमें जीने नहीं देती
   और मैं हूँ के जीने का मज़ाल  रखता हूँ

   खस्तातनों से हाले - दिल न  पूछिए
   दिल में जीने का माल-ओ-मनाल रखता हूँ 

   जिश्म  में तमाम जख्म मुस्कुराते हैं
   औ ज़िगर में  मैं तेरा ख्याल रखता हूँ 

  तू न कर खून-ए-दिल-हसरत -ए आज
  चाक दामन में आरजू-ए-कमाल रखता हूँ  

  मुन्तिजर बैठे हैं के फ़लक पे  महताब उभरे
  दस्त -ए-तनहाई में हौशलों का माल रखता हूँ 
   
                              अज़ीज़ जौनपुरी

  
जब्ते नाल = मुह से आवाज न निकलने देना
जमाल = सौन्दर्य ,मुखकान्ति
दोशीजगी= अल्हड़पन
मजाल =हिम्मत
खस्तातनों = दुखी
माल-ओ-मनाल= दौलत
खून-ए-दिल-हसरत -ए  =  आकांक्षाओं का खून
मुन्तिजर = प्रतीक्षारत

Tuesday, November 25, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : अकेले ही भला था मैं




अकेला  ही  भला  था  मैं  अकेला  ही  भला  हूँ  मैं
बहुत   खुश   हूँ  अकेले  मैं  अकेले   ही चला हूँ मैं

हर कदम पर मुश्किलों का सामना हमने किया है
रात की क्या बात करना गया  दिन में छला हूँ मैं

मिट  गए हर  हर्फ़ जो  हमने  किताबों में लिखे थे
इक- इक बिखरे पन्नो की  किताबों सा जला हूँ मैं

हमारी कोशिशें थीं के तहज़ीब दुनिया को सिखाएं
जब -जब  जलीं  तहज़ीब है   तब -तब  जला हूँ मैं

हिम्मत थी मेरी जो  मौत  को  भी मात देती थी
वक्त की छाती पे अक्सर मूंग जी भर दला हूँ मैं

है  फक्र  मुझको खुद पे इतना जी रहा हूँ शान से
न  उपलब्धियों के नाम पे हाथ अपना मला हूँ मैं

देखकर  मक्कारियाँ   औ   फ़ितरत  जमानें  की
दोस्तों के घर में  अपनें   दुश्मनों  सा पला हूँ  मैं

                                        अज़ीज़ जौनपुरी 

Sunday, November 16, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : पहलू में दिल किसी का




1.
समझा था जिसे आग वो धुआँ निकला
न  वो  कशिश बची न वो मज़ा रहा
2.
रह -रह के  धड़कता है कुछ मिरे भीतर
गोया पहलू में दिल किसी का करवट बदल रहा हो 
3.
है कुछ मिरे अन्दर जो बैचैन सा  रहता   है
जाने तेरा  दिल है या दिल मेरा  
4. 
अच्छा हुआ की आप महफ़िल में नहीं आए 
वर्ना कई रकीब तेरी जाँ पे उतारू थे
5.
ये हुश्न की मंडी है तिज़ारत है इश्क की 
अल्लाह के बन्दों को फुर्शत कहाँ वो आएँ 
     
                               अज़ीज़ जौनपुरी

Wednesday, November 5, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : तू चला देश की देने सुपारी



    

   मुस्लिम भाई समझ गए हैं तेरी क्या औकात बुखारी 
   गद्दारों से हाथ मिला कर तू चला देश की देने  सुपारी

   नब्ज़ तेरी छू कर के देखा तू दे रहा देश को  है  धोखा 
   नमक  देश  का खाकर  तू  करता सुबह  शाम गद्दारी

   फ़ितरत  तेरी नहीं चलेगी  मक्कारी  भी यहीं  जलेगी
   चला  लगाने  देश दाव पर  बना आज तू बड़ा जुआरी 

   नफ़रत  की  भाषा है गढ़ता  बीज  विषैले  है तू बोता 
   नारा हिन्दू मुश्लिम का दे  चलता  चाल  रोज दुधारी 

  मज़हब  की दीवार खड़ी कर दंगों की साजिस है रचता 
  क्या जवाब तू खुद को देगा छोडो भी अब ये मक्कारी 

  हिन्दू -मुस्लिम नहीं लड़ेंगें  साथ  राम अल्लाह कहेंगें
  एक साथ हम मिल के रहेंगे चुप हो जा तू आज बुखारी 
   

                                                                              अज़ीज़ जौनपुरी
   

   

Monday, October 20, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : कौन यहाँ किसका है भैया

     

      दर्द  में जीना सीख लिया है 
      ग़म को पीना सीख लिया है

     चाक गिरीबां कितना भी हो 
     सीना उसको सीख लिया है

     दिया  जहर  जब  अपनों ने
     हंस कर पीना सीख लिया है 
    
     अपने पास तो ग़म की गठरी 
     जिसको ढोना सीख लिया है 

    कौन  यहाँ  किसका है  भैया 
    तनहा  जीना  सीख लिया है 

    फ़ितरत   की  इस  दुनिया में 
    सम्हल के चलना सीख लिया है 

      कृपया गलतिओं की  तरफ़ 
        अवश्य  स्पष्ट  संकेत करें 

                     अज़ीज़ जौनपुरी 
    
    
   
    
   

Friday, October 17, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : चर्चामंच पर जीवंत चर्चा




    
     मंच हो ऐसा सजा
    गुलमोहर के फूल जैसा
    गलतिओं और भूल पर 
    हो मृदुल भावों की वर्षा
    हर शब्द पर हो पैनी नज़र
    औ टिप्पणी हो धार  जैसा 
    सच देखना सुनना व कहना 
    मंच का आसन  हो जैसा
    नित नए नूतन सुझावों 
    औ ज्ञान की हो सतत वर्षा
    रचनाकारों तुम भी सुन लो 
    गर न हो  बाणों की वर्षा 
    हम अधूरे ही रहेगें 
    गर न होगी ज्ञान वर्षा 
    सहजता हो धैर्य हो 
    श्रवण का सामर्थ्य हो 
    तब तपस्या होगी पूरी 
    और होगी सत्य वर्षा 
    सोच  का विस्तार  हो 
   साधना का  भाव हो 
   स्वागत  करें  हम  टिप्पणी का 
   जब  आलोचना  की  हो वर्षा 
   अन्यथा  लेने की  आदत  से
   स्वयं  को  विरत कर  लें 
   तभी  होगी  लेखनी पर 
   सरस्वती  की मान वर्षा 
 
  
                  अज़ीज़ जौनपुरी 
   

   

Tuesday, October 7, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : फेरे और वचन





बदलती दुनियाँ
रंग  बदलते  रिश्ते
बदनाम  होते गिरगिट
और हम जो
चाल चेहरा रंग
और  भी बहुत कुछ
बदलनें में  महारथ
यहाँ तक की
फेरे और वचन
यानी अपनी अपनी 
धड़ल्ले  से बीवियाँ
प्रगतिगामी विश्व  की 
सायद  यही है 
आधुनिकता  की 
परिभाषा


अज़ीज़ जौनपुरी

 

Thursday, October 2, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : जिंदगी बारूद की कहानी तक


  


छेनिओं से हथौड़ों तक 
चोट पर चोट करते 
कभी संबंधों से 
अनुबंधों तक
अनुच्छेदों से विच्छेदों तक
कभी आग से पानी तक 
या फिर आग से 
बारूद की कहानी तक 
इस अखाड़े से उस अखाड़े तक 
कुस्ती और दंगल 
कभी धारा के संग 
कभी विपरीत 
कभी रुकती कभी रेंगती 
कभी होने की गवाही से 
न होने की तबाही तक 
रौशनी से गुमनामी के 
अंधेरों से होती हुई 
एक अंधी सुरंग के बीच 
पड़ाव दर पड़ाव 
घुटने या सीने में 
दर्द की गठरी की तरह 
निचोड़ो तो खून 
खून खून और  खून 
नहीं नहीं 
कत्तई इतना ही नहीं
और बहुत कुछ है 
कभी कंठी तो
कभी सुमिरिनी  कभी
एक चुटकी सिन्दूर 
का बोझ उठाते माथे 
और माथों पर 
न जाने कितनी लकीरें 
कभी आड़ी कभी सीधी 
बेहिसाब दौड़ती
टूटते आस्था और विश्वास 
ढहती  दीवारें  
टुकड़ों में  बटते आंगन 
या  हमारे  दिल 
रूप  को अर्थ  देने से 
अनर्थ  लिखने  तक
के साथ  एक ऐसा  
सफ़ेद झूंठ 
जिस पर  लिखा है रवानी 
दरअसल  एक आग  है 
और  रिस  रहा है  हर पल
एक  लाल  रंग  का पानी 

      अज़ीज़  जौनपुरी



Sunday, September 28, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : बनारस







ज्ञान  ध्यान  विज्ञान बनारस
दुनियाँ  की  है  शान  बनारस

पग -  पग   पर  हैं  घाट  बिछे
तुलसी का   है   मान बनारस

 राण   सांड  साधू   सन्यासी
इन सब  की है  खान बनारस

अस्सी  लंका और गौदौलिया
मिल सब भरते जान बनारस 

लवंगलता  औ  भांग   ठंढई 
ये सब हैं अभिमान बनारस 

लच्छू बिर्जू और बिसमिल्ला
सारे गुणों  की खान बनारस

मुंशी प्रेमचंद की सच्चाई  का
है साहित्य   सम्मान बनारस

नुक्कड़  बैठ  गपियाते ज्ञानी
गुरु   ग्यानी का मान बनारस

बरुणा औ अस्सी के बीच बसी
अस्सी काशी का नाम बनारस

होम हवन ध्यान औ पूजा के
पुण्य दान  का  नाम बनारस

गिरिजा  के  कंठों  में  देखो
भर  देती   है  जान  बनारस 


शांति  स्वरुप  भटनागर  का 
पुरष्कार   विज्ञान   बनारस

"ई रजा काशी" कहते सब मिल
 "ई रजा " तो है  जान बनारस


 पंडित    पंडे     दादा    गुण्डे
इन  सब से  बदनाम बनारस 

गमछा , साड़ी ,  लंगड़ा   आम 
कृष्णन का दर्शन-ज्ञान बनारस 

सोहदों     और   लफंगों   की
छिटाकसी से परेशान बनारस 

 कजरी, ठुमरी, बिरहा,दादरा 
औ  है  मघई  पान  बनारस

मिल हरिचंद औ मर्णकर्णिका
है मार्ग स्वर्ग प्रस्थान बनारस

शंकर  के   त्रिशूल  पर   बैठा
भोले बाबा का ध्यान बनारस

विश्वनाथ  औ  संकटमोचन
के , प्रसाद  का  मान बनारस 

मातु   सितले  औ   माँ  दुर्गे
भैरव नाम कोतवाल बनारस

कबीर  दास  की बाणी  भईया
आज बनी  मुस्कान बनारस

बी.यच.यू.का नाम हो रोशन
ई  हमरा  अरमान  बनारस


कर्मभूमि   है   महामना  की
पं0 ओंकार का गान बनारस 

सर सुन्दर लाल के हाथो  से 
देता  जीवन  दान  बनारस

गौतम  के  पावन  संदेशों का
सारनाथ  है   ज्ञान   बनारस

ज्ञानपीठ   से  महिमामंडित
काशी गुरु  क जान बनारस 

पहलवान कुस्ती और अखाड़ों  
का,लगता  हनुमान  बनारस 

 डोमराज   की   मनमर्जी  है
काशिराज का  मान बनारस  

लालों  की   है तपो भूमि यह
शास्त्री का गौरवगान बनारस 

भारत रत्न  की  गुप्त  भूमि 
का,करता जय गान बनारस 

  ज्ञान पुंज है आर.ल. सिंह का
 है  भूगोल  का ज्ञान बनारस

नुक्कड़  सोहदे  कुल्हड़  चाय 
है गली -गली  दुकान बनारस 

भोर में  घंटा  शाम  को पूजा
गंगा   का  सम्मान  बनारस

दशास्वमेघ की सांध्य आरती 
हर आगंतुक मेहमान बनारस

बिके  यहीं  थे   हरिश्चंद जी
मोक्ष धाम शमशान बनारस 

हाथ लगा  मोदी  के  मोदक 
करते अब गुणगान  बनारस

भईया  सुन  ल  बात हमारी
जीवन क  घमसान बनारस

जय  बोलो  भाई  जय बोलो
जीवन ज्योति  नाम बनारस 

कण -कण  इसका पारस  है
है पारस  का  नाम  बनारस  

         अज़ीज़  जौनपुरी

Sunday, July 27, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : संसद की दीवारों में





 वतन से दूर कहीं  वतन  से दूर नहीं 
                 ( थेम्स  की  घाटी से )


हर   मज़हब   के  फूल   खिलेंगें   संसद  की    दीवारों में
नहीं   चलेगी    कानाफूंसी    सत्ता   के    गलियारों  में 

नहीं  मचेंगें  वाद के झगड़े  नहीं  रहेंगी  झंझट  भाषा की
मानवता   की  भाषा    गढ़   हम   लिख देंगें  अख़बारों में 

सुबह   को    होली   रात   दीवाली  हर  रोज  ईद मनायेगें 
खुशिओं   के   आंसूं    छलकेंगें   घर    आँगन  चौबारों  में 

कर्म भी होगा धर्म भी होगा मानवता की बू-बास भी होगी
लिपि   प्रेम   की   लिख   देंगें मंदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों में 

धर्मवाद का   डंस न  होगा  जातिवाद  का  कंस  न होगा
मानवता  के  पद - चिन्हों   को  हम  गढ़  देंगे मीनारों में

शिल्पी होगा नव विहान का  नयी शाम का सृजन करेगें 
घर -घर की खुशियाँ लिख देंगें लाल किला के  दीवारों में

                                              अज़ीज़ जौनपुरी

Thursday, July 17, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : समझ हुजूम लोग मेरे साथ चलते क्यों है




              


खौफ़  इस कदर  है तो  लोग घर से  निकलते क्यों है 
मैं  बेवफ़ा  ही सही  लोग आखिर  मुझपे मरते क्यों हैं 

 ज़ुल्म ढाया है  वक्त ने ,  के ता-उम्र मैं  तनहा ही रहा 
लोग  समझ  हुजूम  मुझको  मेरे साथ  चलते क्यों है 

न ज़मीं  ही बची पाँव  के नीचे न सर पे आसमान रहा
मैं   बेसहारा  ही  सही  लोग   ऊँगली  पकड़ते  क्यों है 

कदम  कदम पे  फिसलन भरा  इक नया मोड़ आता है
खबर इस हकीकत की है आखिर लोग फिसलते क्यों है 

अच्छा किया की वक्त ने  आईना  दिखा दिया मुझको
छोड़  कर मेरा हाथ जाने वाले लौट हाथ पकड़ते क्यों है 

चलो अच्छा  हुआ ज़माने  ने कुछ तो  दिया   मुझको 
मानी वफ़ा के आज भी मेरे दोस्त सब समझते क्यों है

कुछ तो  है अज़ीज़  तुममें  तू न समझ तन्हां खुद को 
जो जलते हैं देख कर तुमको वही तुझपर मरते क्यों है

 दिल अज़ीज़ का मोहब्बत का शिवाला है दुनियाँ वालों 
 आखिर  लोग   होमो -हवन   करने   से   डरते क्यों  है                                      



अज़ीज़ जौनपुरी

                                     
                   
                                       
                                       
                                         
                                        
                                         
                                        
                                   

                                    

Monday, April 21, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : मुश्किल सफ़र है



खामोश  राहें   हैं  मुश्किल सफ़र है
हवाओं में  पसरा  ज़हर ही ज़हर है 

न साया  कहीं  पे  न  शज़र है कहीं
शोलों की बस्ती  है जलता शहर है

सुना है दवाओं  में  मिलता ज़हर है
यहाँ तो दुआओं में  शामिल ज़हर है      

दिल  के   शहर  में   अँधेरा  बहुत है
यहाँ  खूने - जिगर में बहता ज़हर है

न रंजो-ग़म ही बचे,न बची आरज़ूएं
मोहब्बत की दरिया में बहता ज़हर है

दावा  उल्फ़त का कमज़ोर इतना के  
उल्फत की पुड़िया में बिकता ज़हर है

 न क़ीमती बची कोई सरमाये-इमा की
 दुश्मनी बिक रही  दोस्तों का शहर है 

                       अज़ीज़ "जौनपुरी"


Thursday, September 12, 2013

श्रेष्ठ जन, मित्रों और अनुजों 
                                    मैं ब्लॉग जगत से कुछ समय के लिये स्वयं को पृथक कर रहा हूँ ,आप सब का मैं अत्यंत आभारी हूँ इस वादे के साथ कि मैं पुनः अपनी उपस्थिति दर्ज 
करूँगा 

सादर 


                                                                                अज़ीज़ जौनपुरी 

अज़ीज़ जौनपुरी : न ज़ले न ख़ाक हो

  न ज़ले न ख़ाक हो 

 हाय ये ज़िन्दगी न ज़ले,न ख़ाक हो,न आग़ लगे
 फ़क़ीर  कौम  के आये  हैं न सुर लगे न राग लगे. 

 हाय री क़िस्मत , कि  मर्सिया ही  उन्हें  फ़ाग लगे 
 ख़ाली बोतल सी जवानी के मुंह पे  जैसे क़ाग लगे  

अज़ीब हाल  है सोज़े- ज़हन्नुम भी उन्हें  बाग लगे   
कि  इधर  घर से ज़नाज़ा उठे औ उधर सुहाग लगे 

लुफ्त ख़त्म हो गया  औ  जवानी पकड़ के बैठे हैं 
 हाय ये जवानी न जले ,न खाक हो ,न आग लगे 

 है  बहुत  कुछ  मिज़ाज़  पर मौकूफ़ समझ लीजे 
 मिज़ाज़  भी  ऐसा  की  न राह  लगे न आग़ लगे

 1. नोहा ---शोक गीत , मर्सिया -मृत्यु शोक गीत
सोज़े-ज़हननुम --नर्क की सेज़,
                                             अज़ीज़ जौनपुरी