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Sunday, September 28, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : बनारस







ज्ञान  ध्यान  विज्ञान बनारस
दुनियाँ  की  है  शान  बनारस

पग -  पग   पर  हैं  घाट  बिछे
तुलसी का   है   मान बनारस

 राण   सांड  साधू   सन्यासी
इन सब  की है  खान बनारस

अस्सी  लंका और गौदौलिया
मिल सब भरते जान बनारस 

लवंगलता  औ  भांग   ठंढई 
ये सब हैं अभिमान बनारस 

लच्छू बिर्जू और बिसमिल्ला
सारे गुणों  की खान बनारस

मुंशी प्रेमचंद की सच्चाई  का
है साहित्य   सम्मान बनारस

नुक्कड़  बैठ  गपियाते ज्ञानी
गुरु   ग्यानी का मान बनारस

बरुणा औ अस्सी के बीच बसी
अस्सी काशी का नाम बनारस

होम हवन ध्यान औ पूजा के
पुण्य दान  का  नाम बनारस

गिरिजा  के  कंठों  में  देखो
भर  देती   है  जान  बनारस 


शांति  स्वरुप  भटनागर  का 
पुरष्कार   विज्ञान   बनारस

"ई रजा काशी" कहते सब मिल
 "ई रजा " तो है  जान बनारस


 पंडित    पंडे     दादा    गुण्डे
इन  सब से  बदनाम बनारस 

गमछा , साड़ी ,  लंगड़ा   आम 
कृष्णन का दर्शन-ज्ञान बनारस 

सोहदों     और   लफंगों   की
छिटाकसी से परेशान बनारस 

 कजरी, ठुमरी, बिरहा,दादरा 
औ  है  मघई  पान  बनारस

मिल हरिचंद औ मर्णकर्णिका
है मार्ग स्वर्ग प्रस्थान बनारस

शंकर  के   त्रिशूल  पर   बैठा
भोले बाबा का ध्यान बनारस

विश्वनाथ  औ  संकटमोचन
के , प्रसाद  का  मान बनारस 

मातु   सितले  औ   माँ  दुर्गे
भैरव नाम कोतवाल बनारस

कबीर  दास  की बाणी  भईया
आज बनी  मुस्कान बनारस

बी.यच.यू.का नाम हो रोशन
ई  हमरा  अरमान  बनारस


कर्मभूमि   है   महामना  की
पं0 ओंकार का गान बनारस 

सर सुन्दर लाल के हाथो  से 
देता  जीवन  दान  बनारस

गौतम  के  पावन  संदेशों का
सारनाथ  है   ज्ञान   बनारस

ज्ञानपीठ   से  महिमामंडित
काशी गुरु  क जान बनारस 

पहलवान कुस्ती और अखाड़ों  
का,लगता  हनुमान  बनारस 

 डोमराज   की   मनमर्जी  है
काशिराज का  मान बनारस  

लालों  की   है तपो भूमि यह
शास्त्री का गौरवगान बनारस 

भारत रत्न  की  गुप्त  भूमि 
का,करता जय गान बनारस 

  ज्ञान पुंज है आर.ल. सिंह का
 है  भूगोल  का ज्ञान बनारस

नुक्कड़  सोहदे  कुल्हड़  चाय 
है गली -गली  दुकान बनारस 

भोर में  घंटा  शाम  को पूजा
गंगा   का  सम्मान  बनारस

दशास्वमेघ की सांध्य आरती 
हर आगंतुक मेहमान बनारस

बिके  यहीं  थे   हरिश्चंद जी
मोक्ष धाम शमशान बनारस 

हाथ लगा  मोदी  के  मोदक 
करते अब गुणगान  बनारस

भईया  सुन  ल  बात हमारी
जीवन क  घमसान बनारस

जय  बोलो  भाई  जय बोलो
जीवन ज्योति  नाम बनारस 

कण -कण  इसका पारस  है
है पारस  का  नाम  बनारस  

         अज़ीज़  जौनपुरी

Sunday, July 27, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : संसद की दीवारों में





 वतन से दूर कहीं  वतन  से दूर नहीं 
                 ( थेम्स  की  घाटी से )


हर   मज़हब   के  फूल   खिलेंगें   संसद  की    दीवारों में
नहीं   चलेगी    कानाफूंसी    सत्ता   के    गलियारों  में 

नहीं  मचेंगें  वाद के झगड़े  नहीं  रहेंगी  झंझट  भाषा की
मानवता   की  भाषा    गढ़   हम   लिख देंगें  अख़बारों में 

सुबह   को    होली   रात   दीवाली  हर  रोज  ईद मनायेगें 
खुशिओं   के   आंसूं    छलकेंगें   घर    आँगन  चौबारों  में 

कर्म भी होगा धर्म भी होगा मानवता की बू-बास भी होगी
लिपि   प्रेम   की   लिख   देंगें मंदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों में 

धर्मवाद का   डंस न  होगा  जातिवाद  का  कंस  न होगा
मानवता  के  पद - चिन्हों   को  हम  गढ़  देंगे मीनारों में

शिल्पी होगा नव विहान का  नयी शाम का सृजन करेगें 
घर -घर की खुशियाँ लिख देंगें लाल किला के  दीवारों में

                                              अज़ीज़ जौनपुरी

Thursday, July 17, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : समझ हुजूम लोग मेरे साथ चलते क्यों है




              


खौफ़  इस कदर  है तो  लोग घर से  निकलते क्यों है 
मैं  बेवफ़ा  ही सही  लोग आखिर  मुझपे मरते क्यों हैं 

 ज़ुल्म ढाया है  वक्त ने ,  के ता-उम्र मैं  तनहा ही रहा 
लोग  समझ  हुजूम  मुझको  मेरे साथ  चलते क्यों है 

न ज़मीं  ही बची पाँव  के नीचे न सर पे आसमान रहा
मैं   बेसहारा  ही  सही  लोग   ऊँगली  पकड़ते  क्यों है 

कदम  कदम पे  फिसलन भरा  इक नया मोड़ आता है
खबर इस हकीकत की है आखिर लोग फिसलते क्यों है 

अच्छा किया की वक्त ने  आईना  दिखा दिया मुझको
छोड़  कर मेरा हाथ जाने वाले लौट हाथ पकड़ते क्यों है 

चलो अच्छा  हुआ ज़माने  ने कुछ तो  दिया   मुझको 
मानी वफ़ा के आज भी मेरे दोस्त सब समझते क्यों है

कुछ तो  है अज़ीज़  तुममें  तू न समझ तन्हां खुद को 
जो जलते हैं देख कर तुमको वही तुझपर मरते क्यों है

 दिल अज़ीज़ का मोहब्बत का शिवाला है दुनियाँ वालों 
 आखिर  लोग   होमो -हवन   करने   से   डरते क्यों  है                                      



अज़ीज़ जौनपुरी

                                     
                   
                                       
                                       
                                         
                                        
                                         
                                        
                                   

                                    

Monday, April 21, 2014

अज़ीज़ जौनपुरी : मुश्किल सफ़र है



खामोश  राहें   हैं  मुश्किल सफ़र है
हवाओं में  पसरा  ज़हर ही ज़हर है 

न साया  कहीं  पे  न  शज़र है कहीं
शोलों की बस्ती  है जलता शहर है

सुना है दवाओं  में  मिलता ज़हर है
यहाँ तो दुआओं में  शामिल ज़हर है      

दिल  के   शहर  में   अँधेरा  बहुत है
यहाँ  खूने - जिगर में बहता ज़हर है

न रंजो-ग़म ही बचे,न बची आरज़ूएं
मोहब्बत की दरिया में बहता ज़हर है

दावा  उल्फ़त का कमज़ोर इतना के  
उल्फत की पुड़िया में बिकता ज़हर है

 न क़ीमती बची कोई सरमाये-इमा की
 दुश्मनी बिक रही  दोस्तों का शहर है 

                       अज़ीज़ "जौनपुरी"


Thursday, September 12, 2013

श्रेष्ठ जन, मित्रों और अनुजों 
                                    मैं ब्लॉग जगत से कुछ समय के लिये स्वयं को पृथक कर रहा हूँ ,आप सब का मैं अत्यंत आभारी हूँ इस वादे के साथ कि मैं पुनः अपनी उपस्थिति दर्ज 
करूँगा 

सादर 


                                                                                अज़ीज़ जौनपुरी 

अज़ीज़ जौनपुरी : न ज़ले न ख़ाक हो

  न ज़ले न ख़ाक हो 

 हाय ये ज़िन्दगी न ज़ले,न ख़ाक हो,न आग़ लगे
 फ़क़ीर  कौम  के आये  हैं न सुर लगे न राग लगे. 

 हाय री क़िस्मत , कि  मर्सिया ही  उन्हें  फ़ाग लगे 
 ख़ाली बोतल सी जवानी के मुंह पे  जैसे क़ाग लगे  

अज़ीब हाल  है सोज़े- ज़हन्नुम भी उन्हें  बाग लगे   
कि  इधर  घर से ज़नाज़ा उठे औ उधर सुहाग लगे 

लुफ्त ख़त्म हो गया  औ  जवानी पकड़ के बैठे हैं 
 हाय ये जवानी न जले ,न खाक हो ,न आग लगे 

 है  बहुत  कुछ  मिज़ाज़  पर मौकूफ़ समझ लीजे 
 मिज़ाज़  भी  ऐसा  की  न राह  लगे न आग़ लगे

 1. नोहा ---शोक गीत , मर्सिया -मृत्यु शोक गीत
सोज़े-ज़हननुम --नर्क की सेज़,
                                             अज़ीज़ जौनपुरी 

Monday, September 9, 2013

अज़ीज़ जौनपुरी : आवारा कुत्ते

आवारा कुत्ते 
(फै़ज़ अहमद फ़ैज़ को समर्पित )

हर मोहल्ले में होते  हैं  आवारा कुत्ते 
सूंघते फिरते  रहते हैं  कूड़े के  लित्ते 

हो तेरा मोहल्ला या मेरा मोहल्ला 
मिल जायगें सब जगह  ऐसे आवारा कुत्ते 

देख बोटी  टपकती हैं जिनके मुँह से  लारें
दुम हिलाने में माहिर  हैं होते  ये कुत्ते 

सूँघने में है इनका कोई शानीं नहीं 
आदमी की सकल में भी हैं मिलते ये कुत्ते

बदनाम  होता है  बेचारा कुत्ता
कुत्ते से शातिर भी  होते  ये  कुत्ते

दुनियाँ की दुत्कार है इनकी कमाई
फांकों से  उकता के न मरते  ये कुत्ते

न एहसासे -ज़िल्लत से होते  परीशां ये
नोंच खाने में शातिर हैं होते ये कुत्ते

कोई मज़लूम मखलूक गर इनको अकेली मिले
उसकी हड्डी चबाने में हैं माहिर  ये कुत्ते

इधर सूंघ कर फिर उधर सूघते हैं
हर इक -इक के आते-जाते ये कुत्ते

रिश्ते बनाने में है  बड़े माहिर ये कुत्ते
दुम हिलाते ये कुत्ते ख़ून पीते  ये कुत्ते

गर इसे मांस का एक टुकड़ा दिखे तो
हो नंगे,  झपट टूट पड़ते ये कुत्ते

                                   अज़ीज़ जौनपुरी